June 24, 2024

The Clown

The non-conclusive nature of all information, growth and art forms mock my mortality. 

But, sure there are things to know that are conclusive, absolute and complete, compressing all and everything that is fundamental and root of all that exists. 

No matter where I go or what I become, I will always find that scripture to be sufficient. 

And, even the scripture is useless, to the one who has gone beyond them. For, that One has gone to the end of thought, knowledge or any thinking. 

That One laughs. He/She's the one whom the world calls a Clown. 

June 23, 2024

महानर

जो महानर बनना चाहते हो , 
इसमें तन मन झुलसाते हो |

उस पार पहुँचना चाहते हो , 
जैसे महाबुद्ध की भाँति हो |

तुमने श्रम और कई त्याग किए , 
कई ग्रंथों पर भी जाप किए |

हर गुरुओं का सत्कार करा , 
खर महीधर तक को पार करा |

घनघोर तप और खोज में लीन, 
तुम महाज्ञान के बोझ अधीन |

पग पग ये खोज जो जारी है , 
बुध बनने की तैयारी है |

ब्रह्माण्ड सकल तुम चाहते हो , 
कारणतः ज्ञान अरजाते हो |

जर मुट्ठी में जो भरलो तुम , 
उतना ज्ञान अर्जन करलो तुम |

पांडित्य प्रखर अपना करलो , 
गंगा में देह तुम दाह करलो |

तुम सच को वशना चाहते हो ,
खुद को ज्ञाता बतलाते हो |

आओ अपनी सीमा लांघ दिखाओ , 
ज्ञानी तुम सच को बांध दिखाओ |

और अब कुछ मुनिगण बोलेंगे , 
पिटारे सब अपनी खोलेंगे |

कि हाँ सत किसने जाना है , 
ब्रह्म-सत सबको अनजाना है |

सब ढोंगी ढोंग ही बाँट रहे , 
सब खुदमें खुदको काट रहे |

ये नभ गगन आधृत करदो, 
मनस भूप्रांत खंडित करदो |

जंजाल में लिपटा ध्यान मगन , 
असत्य सत्य में है उलझा मन |

किसका शिक्षक अब कौन बने ? 
किस महाविद्या में कौन रमे ? 

कैसे कौन सच को पाते हैं ? 
क्या मर्यादा अपनाते हैं ? 

क्या महाविष्णु रूप सत है ? 
किस धर्मवाद की जय सत है ? 

तुम कौनसे ज्ञान को समझोगे ? 
किस रीत - रिवाज को भांजोगे ? 

चढ़ना है हिमगिरी शीत अगर , 
उनमें कौन महारणजीत मगर ? 

"आ तुझको सच बतलाता हूँ ", 
ये कहकर सब झुठलाता हूँ |

मन मूँद नयन कुछ जान रहे , 
कोई ईश्वर है, सब मान रहे |

हर ईंट से ईंट बजालो तुम , 
सब कुछ करके सब पा लो तुम |

पर जिस दिन सच को जानोगे , 
हर सच को झूट भी मानोगे |

सब पढ़कर सब कुछ छोड़  चलो , 
तुम खुदमें खुदको मोड़ चलो |

पर फिर भी, 

'अहं' को 'अहं' से अलगारेंगे, 
एक जीतेगा, सब हारेंगे |
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झंकार करो

जब दुविधा मन को भेद गई,
कुछ बीते ग़म ख़ुरेद गई ।
जब चाँद का प्याला टूट गया,
ये मन अकेला छूट गया । 
तब नरसिंह बन प्रहार करो,
झंकार करो झंकार करो ।।

तुम दुविधा से तकरार करो,
गंभीर शिखर को पार करो ।
तुम रक्त बीज संहार करो,
झंकार करो झंकार करो ।।

ख़याल लाल, बिसमिल मिसाल
रणवीर चाल, बंदे मशाल
बाघन की छाल है तेरी खाल,
बुंदेली ढाल में खुद को ढाल
कुछ कर कमाल
कुछ कर कमाल 
खुद पर निसार 
कुछ कर कमाल

अब खोई तपन को कर तू लाल
और सोई रगों में भर गुलाल ।
कुछ लाल करो! गुलाल करो!
संकट की नदियाँ पार करो
फण नदमस्तक विस्तार करो ।
झंकार करो झंकार करो||

ये जान बड़ी ही छोटी है,
किसमत फ़रेबी खोटी है ।
हम एक अकेले होते हैं, 
मद्धम मद्धम से रोते हैं ।
हमें काल गती ने बाँध दिया,
अपशगुना ने भी लाँध दिया ।
हर पेट बड़ी ही छोटी सी,
पर भूख बड़ी ही मोटी सी ।
क्या नींद बनी थी सोने को?
पर रात पड़ी है रोने को ।
अब हसना भी तुम भूल गए,
किस फाँसी पर तुम झूल गए?

अरे विंध्या सा पाहाड़ बनो !
तुम चीर-फाड़ की बाड़ बनो !
तुम भीमसेन हुंकार बनो !
तुम महाकाल का प्यार बनो !
तुम नर्दन और संहार करो !
झंकार करो झंकार करो !

फिर देख गगन तुझमें होगा,
तू वीरचाल में लय होगा ।
कुछ क्षय होगा! कुछ भय होगा!
पर एक नज़ारा तय होगा :
विजय तो होंगे काफी पर, 
ना तुमसा कोई अजय होगा!

इस जीवन को साकार करो,
हर दुविधा से तकरार करो ।
प्रचंड बनो और वार करो,
तुम बन पर्वत झंकार करो,
झंकार करो झंकार करो ।।
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मधुबनी गीत पुराना

मधुबनी गीत पुराना

वो दर्द कहाँ, वो ज़ोर कहाँ 
जो किस्सा मेरा गाता होगा?
मस्त गगन में भटक गए,
ये किस किस को सुनाता होगा?

ना पीर बड़े ,ना ऐब बड़ा था
छोटी मेरी कहानी थी।
(राग सुबध, नवनीत गगन)
ये बातें बड़ी पुरानी थी।
हम बढ़े चले मज़बूत लगन से
अचरज कठिन जवानी थी।
वो पीर बड़ा, वो संत महान
जिसने ये सुध-बुध जानी थी।

मनराग रीत में लीन चला चल
कोकिल बात सुनाती थी।
अंजान फेर, अंधेर पड़े बस
भूल-निर्मित कहानी थी।
प्रीत मिले या शीत मिले
पर ख़ून जलाना सीखा था।
इनाम शिखर, शमशीर मिले
हर चूक भुलाना सीखा था।
हम आग लगन में बड़े हुए,
निर्भीक! तपन में खड़े हुए,
मसरूफ़ अगन से काम किया।
कमज़र्फ़ बड़े पर नाम किया।
बख्शीश तुम्हारा हिस्सा होगा,
कर्म हमारा किस्सा होगा।
गीत मिला फिर रीत मिला,
हमने तब लिखना सीखा था।
मनधीर डगर से उखड़ गया,
पर चाँद का सपना फीका था।
काश! रात ने बीर सहर पर 
मान हमारा रक्खा होता।
मान हमारा रखते तो,
इमान हमारा पक्का होता।
बढ़े चले, हम बढ़े चले
फिर मधुबन रात दिवानी होगी।
कालकोट के चीर शिखर पर
हासिल नयी कहानी होगी।
काल-नौक के नीर डगर पर
हमदम बड़े पुराने होंगे।
शाख-तिलक पर पड़े पड़े
फिर बातें वही पुरानी होंगी।

वक्त माँगता माँग पुरानी 
पल पल चलना जारी है।
त्याग नींद अब भोर पहर में 
रमने की तैयारी है।
खोल नयन देखा था सपना 
मधुबन रात सुहानी थी।
पर बढ़े चले, अब बढ़े चले
वो मधुबन सिर्फ़ कहानी थी।

धीर नगर हम छोड़ चले,
उन गलियों से मुख मोड़ चले,
हम बढ़े चले, हम बढ़े चले,
फिर मधुबन रात दिवानी होगी।
कर्म हमारा किस्सा होगा।
शूर भरी जवानी होगी।
शाख-तिलक पर मिलकर तुमसे 
बातें वही पुरानी होंगी।

हम ओढ़ पीत और राख लगाकर 
संतों के संग चले गए।
कुछ गलत किया, कुछ सही किया
हम दोनों कर के चले गए।

 - राज आर्यन
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June 18, 2024

Thoughts

An artist is quite near to insanity, just at the edge of being perished. Yet living and alive! 

June 04, 2024

Thoughts

Stay resolute within, to be unwavered by factors outside. - 

Thoughts

Stay resolute within, to be unwavered by factors outside. - 

June 03, 2024


 


 

On the Edge of Evening


 All the happy flowers of the day,

Set afresh to bloom on misty morn.
And I as a set aside enjoy the waning evening.

For woe on woe to speak,
But that will simply aside him in silence.

Let me be a failure,
As failure as a Bukowski,
And all ugly
As he with his face!
Or a Beethoven,
As thrashed and beaten by his father.
And as him, lost in love.
Unlike those flowers at the morn
Let me sleep and rest
With my young Chatterton,
Near and close to his peaceful grave.

Across all eyes
Of these tossing sea of people
Sometimes I see nothing,
Or rather nothing for me to see.
Am I not selfish as they?

Ah! This passing crowd.
Power is necessary to be someone.
Yet sometimes, I'm happy to be with
And talk to that street hawker
Sitting somewhere
On the footpaths near by.
All they could hear is,
The groan of their gut
And that thump in the chest.
It's nothing to romanticise about,
Neither its poetic.

Look at yourself!
Who will stand for you?
What benign prodigy you are?

This that I write
Is all, that I found,
All that I found my heart to be desiring :

A place with people to call 'home'.

A 'someone' to share with, the feeling of being understood.

ढूंढता हूँ

 उन ख़ो चुकीं नफ़ासतों की सहर ढूंढता हूँ

उजड़े उन गुलसितों को बेसबर ढूंढता हूँ


रौशनदानों से फ़कत तकलीफ़ हुई इतनी

घर छोड़ अंधियारों में बसर ढूंढता हूँ


कब निकल गए उनकी मस्कन-ए-चाहतों से

गुज़रे उन लम्हों में वो पहर ढूंढता हूँ


सर-ए-सांझ को डूबती सुने किसकी राधा

छोड़ गया हो कृष्ण वो इस क़दर ढूंढता हूँ


कबतक खिल सकेगी वो मुस्काँ इन आँखों में

भूलने से पहले बस इक नज़र ढूंढता हूँ


हैं मिलते तो कई बाद-ए-फ़ुर्कत में 'राज'

न मिलती वो आज भी मगर ढूँढता हूँ     

रसवंती

ये आँखें जो हैं नम पड़ीं
वो दूर तक नशे में हैं
जो दिख रहा है उस डगर
सब दूर तक नशे में है

क्या ज़मी? है क्या समा?
क्या है ये ढुलता कारवाँ?
धुत्त! इक सिरे में है
और दूर तक नशे में है

दर ब दर होड़ है
जहाँ में चारों शोर है
कौन किस समय में है
सब दूर तक नशे में है

नींद की ही आग में
या मधुकाओं की बाग में
कौन कि विषय में है?
सब दूर तक नशे में है

जा रही घड़ी में जो
या हो रहे स्वपन में हो
सब सने समय में हैं
और अब समय नशे में है

नींद-घन जो छा रही
मधु के बूंद ला रही
ये बूंद जिस गले में है
वो दूर तक नशे में है

ये झूमती निगाह है
हर जिसको इस्की चाह है
वो डोलते हृदय में है
और दूर तक नशे में है

कौन सी ये चाल है
सौ हिर्नियों की ताल है
चलीं भी उस पते पे हैं
जो दूर तक नशे में है

क्या ख़्वाब या ख़्याल है
ये नींद भरी प्याल है
सुरूर कहकशे में है
सब दूर तक नशे में है

छलकती हर घटा से जो
महकती हर दिशा में है
जो है खड़ा इन राहों में
वो दूर तक नशे में है

रसवंतिका की डोर है
ना कोई इसका तोड़ है
जो खो गया, मज़े में है
बस दूर तक नशे में है

भूल जाएँ

हैं कितने तुम्हारे ख़्यालाना 

जो तुम्हारा ग़म समझते हैं

कि तुम्पर गुजरे ग़म को भी 

अपना ग़म समझते हैं


पर हाल भी देखो कैसा है

तुम कहती हो ' जी ऐसा है:

आप मेरे ख़्याल भुला दीजे

अरमानों को गॅंवा दीजे

भूल जाएँ अगर, बेहतर होगा '

पर कैसे कहूँ यह बात मैं 

दर्द दिखता नहीं, मगर होगा


चलो फिर भी जाने देते हैं

दर्द तुम्हारा है ना, तो सताने देते हैं


थे तुम्हारी याद में पड़े

साथ हम अपने ग़म के

ख़्याल हुआ ग़म का तेरे

बाद भी अपने ग़म के


पहले अदा की जो तुमने

लिया वो ग़म कर ख़तम तुमको

देखो क्या हसीन शिकायत है

मेरे ग़म को देख हो रहा ग़म तुमको


भूल जाइये क़िस्सा

पर ना चाहा है कम उसे

अब है खुशी उसकी कि

भूल जाएँ हम उसे |


बेदिली!

क्या वास्ते उसके ग़म के, 

ग़म अपना भी भूल जाएँ ? 

हाँ! खुशी हो उसकी जिसमें 

हर खुशी वो क़ुबूल जाएँ ।


हम जो थे सो हैं नहीं

 शौक - ओ - शख़्स की भीड़ में, हम जो थे सो हैं नहीं

तुम किसी के हो गए , और हम किसी के हैं नहीं |


क्या गिला थी, क्या वजह? यूँ बिछड़ते हैं नहीं

वो उस गली निकल गए, हम जिस गली के हैं नहीं । 


जहाँ को चलते आगए, वहाँ से लौटते नहीं

तुम उस ज़मीं पे आगए, हम जिस ज़मीं के थे नहीं । 


जो प्रेम सिलसिले वो थे, वो सिलसिले ही थे नहीं

पुरानी यादों के हो तुम, कोई ख़्वाब बन चुके नहीं । 


है कुछ पलों का शोरगुल, ये बात क्यों कही नहीं? 

वफ़ा - ओ - दिल की बात थी, अब बात भी रही नहीं। 


साथ के सफ़र में थे, अब साथ का सफ़र नहीं

छत जो बन रही थी वो, अब है किसी के सर नहीं। 


हैं रंग घुलते शहरों में, बेरंगों की ख़बर नहीं

तुम नए पतों से डर रहे, हम नए पतों के दर नहीं |

Epistle


 

June 01, 2024

Can I not love thee with eternal love?

 

PROLOGUE
Beneath the Silver moon with starless sky,
With her hands in his own, he thus began :

Can I not love thee with eternal love?
For is it so, that love should love demand?
For I don't wish to live with thee apart.
Nor soul of mine can in this motion breathe.
Nor tracts of hell! Nor glimpse of heavens bright
Distract my thoughts who thy sweet face behold.
But not thy face, thy view, thy eyes or lips
I love. I love thy whole existence made.
Do not I write to justify my love.
Nor do I wish to win thy heart eftsoon.
Not I am some enchantress of thy mind.
But of this fact be sure that I am loon.
And laugh at me!
They laugh who read my work.
For why a man should in such madness breed?
But its no madness or a worthless cause.
Its love! but not the love that we perceive.
Its love when shameless sun forever shines.
Its love when helpless mom her baby feeds.
Its love when she beholds her face in child.
Its love when summer's winds relieves thy face.
And so its love when I do chant thy name.
I can not stop to feel my love for thee.
Nor do I ask thy love in love's return.
I shall be happy, warm, in peace content.
I shall live, laugh and smile and spend my days.
I shall live glorious life as others do.
But this I promise thee, I will thee miss.💔