June 03, 2024

ढूंढता हूँ

 उन ख़ो चुकीं नफ़ासतों की सहर ढूंढता हूँ

उजड़े उन गुलसितों को बेसबर ढूंढता हूँ


रौशनदानों से फ़कत तकलीफ़ हुई इतनी

घर छोड़ अंधियारों में बसर ढूंढता हूँ


कब निकल गए उनकी मस्कन-ए-चाहतों से

गुज़रे उन लम्हों में वो पहर ढूंढता हूँ


सर-ए-सांझ को डूबती सुने किसकी राधा

छोड़ गया हो कृष्ण वो इस क़दर ढूंढता हूँ


कबतक खिल सकेगी वो मुस्काँ इन आँखों में

भूलने से पहले बस इक नज़र ढूंढता हूँ


हैं मिलते तो कई बाद-ए-फ़ुर्कत में 'राज'

न मिलती वो आज भी मगर ढूँढता हूँ     

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