उन ख़ो चुकीं नफ़ासतों की सहर ढूंढता हूँ
उजड़े उन गुलसितों को बेसबर ढूंढता हूँ
रौशनदानों से फ़कत तकलीफ़ हुई इतनी
घर छोड़ अंधियारों में बसर ढूंढता हूँ
कब निकल गए उनकी मस्कन-ए-चाहतों से
गुज़रे उन लम्हों में वो पहर ढूंढता हूँ
सर-ए-सांझ को डूबती सुने किसकी राधा
छोड़ गया हो कृष्ण वो इस क़दर ढूंढता हूँ
कबतक खिल सकेगी वो मुस्काँ इन आँखों में
भूलने से पहले बस इक नज़र ढूंढता हूँ
हैं मिलते तो कई बाद-ए-फ़ुर्कत में 'राज'
न मिलती वो आज भी मगर ढूँढता हूँ
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