जो महानर बनना चाहते हो ,
इसमें तन मन झुलसाते हो |
उस पार पहुँचना चाहते हो ,
जैसे महाबुद्ध की भाँति हो |
तुमने श्रम और कई त्याग किए ,
कई ग्रंथों पर भी जाप किए |
हर गुरुओं का सत्कार करा ,
खर महीधर तक को पार करा |
घनघोर तप और खोज में लीन,
तुम महाज्ञान के बोझ अधीन |
पग पग ये खोज जो जारी है ,
बुध बनने की तैयारी है |
ब्रह्माण्ड सकल तुम चाहते हो ,
कारणतः ज्ञान अरजाते हो |
जर मुट्ठी में जो भरलो तुम ,
उतना ज्ञान अर्जन करलो तुम |
पांडित्य प्रखर अपना करलो ,
गंगा में देह तुम दाह करलो |
तुम सच को वशना चाहते हो ,
खुद को ज्ञाता बतलाते हो |
आओ अपनी सीमा लांघ दिखाओ ,
ज्ञानी तुम सच को बांध दिखाओ |
और अब कुछ मुनिगण बोलेंगे ,
पिटारे सब अपनी खोलेंगे |
कि हाँ सत किसने जाना है ,
ब्रह्म-सत सबको अनजाना है |
सब ढोंगी ढोंग ही बाँट रहे ,
सब खुदमें खुदको काट रहे |
ये नभ गगन आधृत करदो,
मनस भूप्रांत खंडित करदो |
जंजाल में लिपटा ध्यान मगन ,
असत्य सत्य में है उलझा मन |
किसका शिक्षक अब कौन बने ?
किस महाविद्या में कौन रमे ?
कैसे कौन सच को पाते हैं ?
क्या मर्यादा अपनाते हैं ?
क्या महाविष्णु रूप सत है ?
किस धर्मवाद की जय सत है ?
तुम कौनसे ज्ञान को समझोगे ?
किस रीत - रिवाज को भांजोगे ?
चढ़ना है हिमगिरी शीत अगर ,
उनमें कौन महारणजीत मगर ?
"आ तुझको सच बतलाता हूँ ",
ये कहकर सब झुठलाता हूँ |
मन मूँद नयन कुछ जान रहे ,
कोई ईश्वर है, सब मान रहे |
हर ईंट से ईंट बजालो तुम ,
सब कुछ करके सब पा लो तुम |
पर जिस दिन सच को जानोगे ,
हर सच को झूट भी मानोगे |
सब पढ़कर सब कुछ छोड़ चलो ,
तुम खुदमें खुदको मोड़ चलो |
पर फिर भी,
'अहं' को 'अहं' से अलगारेंगे,
एक जीतेगा, सब हारेंगे |
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