June 23, 2024

झंकार करो

जब दुविधा मन को भेद गई,
कुछ बीते ग़म ख़ुरेद गई ।
जब चाँद का प्याला टूट गया,
ये मन अकेला छूट गया । 
तब नरसिंह बन प्रहार करो,
झंकार करो झंकार करो ।।

तुम दुविधा से तकरार करो,
गंभीर शिखर को पार करो ।
तुम रक्त बीज संहार करो,
झंकार करो झंकार करो ।।

ख़याल लाल, बिसमिल मिसाल
रणवीर चाल, बंदे मशाल
बाघन की छाल है तेरी खाल,
बुंदेली ढाल में खुद को ढाल
कुछ कर कमाल
कुछ कर कमाल 
खुद पर निसार 
कुछ कर कमाल

अब खोई तपन को कर तू लाल
और सोई रगों में भर गुलाल ।
कुछ लाल करो! गुलाल करो!
संकट की नदियाँ पार करो
फण नदमस्तक विस्तार करो ।
झंकार करो झंकार करो||

ये जान बड़ी ही छोटी है,
किसमत फ़रेबी खोटी है ।
हम एक अकेले होते हैं, 
मद्धम मद्धम से रोते हैं ।
हमें काल गती ने बाँध दिया,
अपशगुना ने भी लाँध दिया ।
हर पेट बड़ी ही छोटी सी,
पर भूख बड़ी ही मोटी सी ।
क्या नींद बनी थी सोने को?
पर रात पड़ी है रोने को ।
अब हसना भी तुम भूल गए,
किस फाँसी पर तुम झूल गए?

अरे विंध्या सा पाहाड़ बनो !
तुम चीर-फाड़ की बाड़ बनो !
तुम भीमसेन हुंकार बनो !
तुम महाकाल का प्यार बनो !
तुम नर्दन और संहार करो !
झंकार करो झंकार करो !

फिर देख गगन तुझमें होगा,
तू वीरचाल में लय होगा ।
कुछ क्षय होगा! कुछ भय होगा!
पर एक नज़ारा तय होगा :
विजय तो होंगे काफी पर, 
ना तुमसा कोई अजय होगा!

इस जीवन को साकार करो,
हर दुविधा से तकरार करो ।
प्रचंड बनो और वार करो,
तुम बन पर्वत झंकार करो,
झंकार करो झंकार करो ।।
.
.
.
follow ~ @the.poetic.flow
𝑯𝒂𝒑𝒑𝒚 𝑩𝒊𝒓𝒕𝒉𝒅𝒂𝒚 𝒕𝒐 𝒀𝒐𝒖 @mayank.bimi ♡
.
.
.

No comments:

Post a Comment