ये आँखें जो हैं नम पड़ीं
वो दूर तक नशे में हैं
जो दिख रहा है उस डगर
सब दूर तक नशे में है
क्या ज़मी? है क्या समा?
क्या है ये ढुलता कारवाँ?
धुत्त! इक सिरे में है
और दूर तक नशे में है
दर ब दर होड़ है
जहाँ में चारों शोर है
कौन किस समय में है
सब दूर तक नशे में है
नींद की ही आग में
या मधुकाओं की बाग में
कौन कि विषय में है?
सब दूर तक नशे में है
जा रही घड़ी में जो
या हो रहे स्वपन में हो
सब सने समय में हैं
और अब समय नशे में है
नींद-घन जो छा रही
मधु के बूंद ला रही
ये बूंद जिस गले में है
वो दूर तक नशे में है
ये झूमती निगाह है
हर जिसको इस्की चाह है
वो डोलते हृदय में है
और दूर तक नशे में है
कौन सी ये चाल है
सौ हिर्नियों की ताल है
चलीं भी उस पते पे हैं
जो दूर तक नशे में है
क्या ख़्वाब या ख़्याल है
ये नींद भरी प्याल है
सुरूर कहकशे में है
सब दूर तक नशे में है
छलकती हर घटा से जो
महकती हर दिशा में है
जो है खड़ा इन राहों में
वो दूर तक नशे में है
रसवंतिका की डोर है
ना कोई इसका तोड़ है
जो खो गया, मज़े में है
बस दूर तक नशे में है
June 03, 2024
रसवंती
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
-
“If you don’t know where you have come from, you don’t know where you’re going.” — Maya Angelou. Rightly, it has been said and recounted a...
-
जब दुविधा मन को भेद गई, कुछ बीते ग़म ख़ुरेद गई । जब चाँद का प्याला टूट गया, ये मन अकेला छूट गया । तब नरसिंह बन प्रहार करो, झंकार करो झंकार ...
No comments:
Post a Comment