हैं कितने तुम्हारे ख़्यालाना
जो तुम्हारा ग़म समझते हैं
कि तुम्पर गुजरे ग़म को भी
अपना ग़म समझते हैं
पर हाल भी देखो कैसा है
तुम कहती हो ' जी ऐसा है:
आप मेरे ख़्याल भुला दीजे
अरमानों को गॅंवा दीजे
भूल जाएँ अगर, बेहतर होगा '
पर कैसे कहूँ यह बात मैं
दर्द दिखता नहीं, मगर होगा
चलो फिर भी जाने देते हैं
दर्द तुम्हारा है ना, तो सताने देते हैं
थे तुम्हारी याद में पड़े
साथ हम अपने ग़म के
ख़्याल हुआ ग़म का तेरे
बाद भी अपने ग़म के
पहले अदा की जो तुमने
लिया वो ग़म कर ख़तम तुमको
देखो क्या हसीन शिकायत है
मेरे ग़म को देख हो रहा ग़म तुमको
भूल जाइये क़िस्सा
पर ना चाहा है कम उसे
अब है खुशी उसकी कि
भूल जाएँ हम उसे |
बेदिली!
क्या वास्ते उसके ग़म के,
ग़म अपना भी भूल जाएँ ?
हाँ! खुशी हो उसकी जिसमें
हर खुशी वो क़ुबूल जाएँ ।
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